The Partner's Guide
After-birth wellbeingA warm, practical guide for the partner of a new mother who is struggling after birth: what the low days really mean, what your steadiness can do, when to reach a doctor now, and how to face it together instead of leaving her to cope alone.
जिस औरत से आप प्यार करते हैं, अगर बच्चे के आने के बाद से वो उदास, घबराई हुई, रोती हुई, या बस अपने जैसी नहीं लग रही, तो आप कुछ गलत नहीं सोच रहे। सचमुच कुछ चल रहा है, और आपने इसे महसूस किया, यहीं से मदद शुरू होती है।
शायद वो रोती है और हर बार बता भी नहीं पाती क्यों। शायद बच्चे को लेकर एक चिंता उसे जकड़े रहती है जो रुकने का नाम नहीं लेती। शायद वो चुप और दूर सी हो गई है, या छोटी छोटी बातों पर झल्ला जाती है, या बच्चा आखिरकार सो भी जाए तो भी वो जागती पड़ी रहती है। शायद वो बार बार कहती है कि वो ठीक है, जबकि आपके अंदर की हर चीज कह रही है कि वो ठीक नहीं है।
आप उसे किसी से भी बेहतर जानते हैं। तो जब जिस इंसान से आपने शादी की, वो खुद के लिए ही अजनबी सी लगने लगे, तो उस एहसास पर भरोसा कीजिए। जन्म के बाद के हफ्तों और महीनों में उदास, घबराया हुआ, या अपने जैसा न लगना आम बात है, और यह एक पहचानी हुई सेहत की दिक्कत है, कोई कमजोर चरित्र नहीं।
यह किताब उस पर कोई लेबल नहीं लगाएगी। वो सिर्फ एक doctor ही कर सकते हैं। यह किताब बस इतना करेगी कि आप समझ सकें कि वो शायद किस दौर से गुजर रही है, और आपको दिखाएगी कि आपका साथ में होना सचमुच क्या कर सकता है।
जरा सोचिए कि उसके दिन अब सचमुच कैसे बीतते हैं। टूटी हुई रातें जो कभी असली नींद में नहीं बदलतीं। एक शरीर जो अभी भी भर रहा है। एक नन्हा सा इंसान जिसे हर पल उसकी जरूरत है और जो अभी बदले में कुछ दे भी नहीं सकता। और इन सबके इर्द गिर्द, सब की नजरों का चुपचाप दबाव, हर किसी की अपनी राय, और वो अनकही "लोग क्या कहेंगे" अगर वो उस तरह न खिली खिली दिखे जैसे एक नई माँ को दिखना चाहिए।
इसमें से कुछ भी उसका कमजोर होना नहीं है। यह जिंदगी का एक कठिन, थका देने वाला दौर है जो एक ऐसे शरीर और मन पर आ पड़ा है जो पहले से ही खिंचे हुए हैं। सबसे अच्छी और काम की बात जो आप अपने दिमाग में रख सकते हैं, वो सीधी सी है: यह वो माँ बनने में नाकाम नहीं हो रही। यह वो इतना बोझ अकेले उठा रही है जितना कोई अकेला इंसान नहीं उठा सकता।
अगले कुछ दिन, बस ध्यान दीजिए, कुछ ठीक करने की कोशिश किए बिना। देखिए कि कब वो थोड़ी हल्की लगती है और कब डूब जाती है। आप अभी इसे सुलझा नहीं रहे। आप उसका ढंग समझ रहे हैं, ताकि आपको पता चले कि उसे आपकी सबसे ज्यादा जरूरत कब है।
अंदर से वो शायद खुद को दोषी, डरी हुई, सुन्न, या ऐसा महसूस करती हो जैसे वो उस एक काम में नाकाम हो रही है जिसे उसे आना ही चाहिए। इसे प्यार से नाम देना उसे बताता है कि इसमें वो अकेली नहीं है।
बाहर से यह उदासी, या चिड़चिड़ाहट, या दूरी जैसा लग सकता है। अंदर से यह अक्सर इससे कहीं भारी होता है। इस जगह पर पहुँची कई औरतें एक गहरा अपराधबोध महसूस करती हैं कि उन्हें खुश होना चाहिए और वो नहीं हैं। कुछ अपने ही खयालों से डर जाती हैं, या शर्मिंदा होती हैं कि बच्चे से वो जुड़ाव नहीं बना जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी। कुछ बस बुझी बुझी सी महसूस करती हैं, जैसे यूँ ही सब निभाए जा रही हों।
आपके लिए सबसे जरूरी बात जिस पर यकीन करना है, वो यह है: यह "कर नहीं पा रही" है, "करना नहीं चाहती" नहीं। वो दूर रहने या तनाव में रहने को चुन नहीं रही। उसका मन और शरीर, टूटी नींद और एक बड़े बदलाव से थके हुए, अपनी हद पर आ पहुँचे हैं। बच्चे के बाद कम नींद और आसपास कम सहारा, ये दो चीजें रिसर्च ऐसा महसूस करने से जोड़ती है, और इसीलिए घर में लगातार मिलने वाली मदद कोई छोटा सा इशारा नहीं है।
जिस दिन मैंने यह पूछना बंद किया कि वो बस खुश क्यों नहीं रह सकती, और यह पूछना शुरू किया कि उसे क्या चाहिए, उसी दिन से बात संभलने लगी।
एक पति, छठे हफ्ते में
हमारे कई घरों में फैसला जल्दी और बेरहमी से आ जाता है: वो नाटक कर रही है, वो ढल नहीं रही, बाकी औरतें तो निभा लेती हैं, कोई मजबूत औरत होती तो झेल लेती। वो फैसला गलत है, और उसे उठाना उसके लिए भारी है। वो कमजोर नहीं है, और वो बुरी माँ नहीं है। वो एक ऐसा इंसान है जो किसी असली चीज से गुजर रही है जिसका एक नाम है और आगे का एक रास्ता भी।
इसमें से कुछ भी हमेशा के लिए नहीं है, और इसमें न आपकी गलती है न उसकी। इन हफ्तों में वो जिस दौर से गुजर रही है, वो आम भी है और इसका इलाज भी है, और सही सहारे से और जरूरत पड़ने पर doctor की मदद से यह अक्सर हल्का होता जाता है। इस हिस्से का मकसद बस इतना है: "उसे अब तक इससे उबर जाना चाहिए था" के बजाय "वो किसी असली चीज से जूझ रही है" से शुरुआत कीजिए, और उसके बाद आप जो भी करेंगे, वो और नरमी से पहुँचेगा।
अगली बार जब आपको खीज हो कि वो पहले जैसी क्यों नहीं हो पा रही, तो "वो बस निभा क्यों नहीं लेती" वाले खयाल को "उसका पूरा वजूद अभी बहुत ज्यादा झेल रहा है" से बदलकर देखिए। ध्यान दीजिए कि आपके अपने कंधे थोड़े हल्के होते हैं या नहीं। आपका शांत होना पहले से ही मदद का एक हिस्सा है।
सबसे बड़ी मदद कोई शानदार हल या एकदम सही शब्द नहीं हैं। यह कुछ सीधी, रोजमर्रा की बातें हैं: घर काम का बोझ अपने ऊपर लीजिए, उसकी नींद बचाइए, और हल निकालने की जल्दी किए बिना सुनिए।
आपके पास कोई एकदम सही भाषण तैयार होना जरूरी नहीं है। एक साथी जो करता है, वो यहाँ सचमुच मायने रखता है। कई अध्ययनों की समीक्षा दिखाती है कि जन्म के बाद के शुरुआती हफ्तों में भरोसेमंद, देखभाल भरा सहारा एक नई माँ के उदासी में जाने की गुंजाइश कम कर देता है। बोझ अपने ऊपर लेना और साथ बने रहना कोई छोटा इशारा नहीं है; यह उन चीजों में से है जो सचमुच मदद करती दिखी हैं।
इनमें से दो बातों पर जरा ठहरना ठीक रहेगा। पहली, नींद। टूटी रातें सिर्फ थका नहीं देतीं; वो मूड और संतुलन को घिस देती हैं, और यह उन चीजों में से है जो जन्म के बाद उदास महसूस करने से जुड़ी हैं। अगर आप रात में एक बार दूध पिलाना अपने ऊपर ले लें, या बच्चे को संभाल लें ताकि उसे एक बार की बिना टूटी नींद मिल जाए, तो आप उन गिनी चुनी चीजों में से एक को बचा रहे हैं जो सचमुच उसे संभलने में मदद करती है।
दूसरी, सुनना। जब वो आखिरकार मुश्किल बात कह देती है, तो मन करता है कि उसे ठीक कर दें, दिलासा दें, कोई योजना दे दें। कोशिश कीजिए कि पहले उससे रुक जाएँ। अक्सर सबसे ज्यादा जो मदद करता है वो कोई हल नहीं, बल्कि सुना जाना है: "यह तो बहुत मुश्किल है। मैं यहीं हूँ। हम इससे पार निकलेंगे।" उसकी एक जोड़ी की तरह, साथ मिलकर मदद करना, उसे अकेले जूझने देने से बेहतर काम करता है; एक अध्ययन में, जिन माँओं को एक जोड़ी की तरह सहारा मिला, उनमें उदासी के लक्षण उनसे कम थे जिन्हें अकेले निभाने के लिए छोड़ दिया गया।
इस हफ्ते एक बोझ चुनिए और उसे पूरी तरह उसके ऊपर से हटा लीजिए, न पूछकर, न शुक्रिया के लिए। रात में एक बार दूध पिलाना। सारे मेहमान। हर वक्त का खाना। वो चुनिए जिससे उसे सबसे ज्यादा राहत मिले, और बस उसे उठा लीजिए।
कुछ बदलाव ऐसे नहीं हैं कि उनके गुजर जाने का इंतजार किया जाए। अगर आप इन्हें देखें, तो इसे जरूरी मानिए और उसी दिन doctor या किसी helpline तक पहुँचिए। यह medical मदद है, इस बात का संकेत नहीं कि आप में से किसी ने कुछ गलत किया।
जो वो झेल रही है, उसमें से ज्यादातर समय, आराम और सहारे से हल्का हो जाता है। पर कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिनका मतलब है कि अभी कदम उठाने का वक्त है, बाद में नहीं। अगर आप कभी उसे यह कहते सुनें कि वो यहाँ नहीं रहना चाहती, या खुद को या बच्चे को नुकसान पहुँचाने की बात करे, तो इसे आपात स्थिति मानिए और उसी दिन मदद तक पहुँचिए।
उसी दिन doctor या किसी helpline तक पहुँचिए अगर बच्चे के सोने पर भी उसे नींद नहीं आती, वो खाना या अपना खयाल रखना छोड़ देती है, बच्चे से या हकीकत से डरा देने वाली हद तक कटी हुई लगती है, या कहती है या इशारा करती है कि वो जीना नहीं चाहती, या यह कि वो खुद को या बच्चे को नुकसान पहुँचा सकती है। आपका पूरी तरह पक्का होना जरूरी नहीं। अगर इनमें से कुछ भी आपके सामने है, तो इंतजार करके उम्मीद लगाने के बजाय मदद के लिए हाथ बढ़ाना हमेशा सही होता है।
अगर आप अभी परेशान हैं
आपको कुछ भी पहचान कर बताना या इसे अकेले संभालना जरूरी नहीं है। आज ही उसके doctor को फोन कीजिए, उसे किसी अस्पताल ले जाइए, या किसी helpline पर बात कीजिए, उसके साथ अगर वो आए, उसके लिए अगर वो न आ पाए। जल्दी मदद माँगना जरूरत से ज्यादा घबराना नहीं है। यह बिल्कुल सही काम है।
यह सब चुपचाप उठाना आप पर भी असर डालता है। अपने बोझ का खयाल रखना स्वार्थ नहीं है; यह उसका खयाल रख पाने का ही एक हिस्सा है।
आप बहुत कम नींद पर चल रहे हैं, घर को थामे हुए हैं, उसके और बच्चे के लिए फिक्रमंद हैं, और शायद सबको यही बता रहे हैं कि आप ठीक हैं। यह किसी को भी घिस देता है। और पता चलता है कि साथी भी सीधे इसकी चपेट में आते हैं: नए पिताओं पर हुई रिसर्च पाती है कि करीब दस में से एक इंसान बच्चे के जन्म के आसपास उदासी के दौर से गुजरता है, जो अक्सर एकदम शुरू में नहीं, बल्कि बच्चे के आने के बाद के महीनों में धीरे धीरे बढ़ता है। यह आपको कमजोर नहीं बनाता, और यह आपको किसी घटिया सहारे में नहीं बदलता। यह आपको इंसान बनाता है, और खयाल रखे जाने के काबिल।
यह इतना आम है कि दोनों माता पिता एक ही समय उदास हो सकते हैं। जोड़ों को साथ देखने वाले अध्ययन पाते हैं कि कई परिवारों में, जन्म के आसपास माँ और उसका साथी दोनों जूझ रहे होते हैं। यह लोग क्या कहेंगे, इस डर से इसे छिपाने की वजह नहीं है। यह साथ में और जल्दी मदद लेने की वजह है।
यहाँ अपना खयाल रखना कोई ऊपर से जोड़ी गई ऐशोआराम की चीज नहीं है; यही आपको खड़ा रखता है ताकि आप उसके लिए डटे रह सकें। जहाँ बन पड़े, थोड़ी नींद बचाइए। सब कुछ चुपचाप ढोने के बजाय कुछ ईमानदार बातें कीजिए। अपने खेमे में एक इंसान रखिए, एक भाई, एक दोस्त, कोई और नया माता पिता जो समझता हो। खाली बर्तन से आप किसी को नहीं भर सकते, और उसे आपकी परफेक्ट होने से ज्यादा आपके संभले हुए होने की जरूरत है।
आज रात, किसी एक भरोसे के इंसान से एक ईमानदार बात कह दीजिए, खुलकर: "यह उससे कहीं मुश्किल है जितना मैंने सोचा था।" आपको बदले में कोई सलाह चाहिए ही नहीं। जो सच है वो किसी ऐसे इंसान से कह देना जो जज न करे, कुछ बोझ हल्का कर देता है, और यह कमजोरी का ठीक उल्टा है।
आपको यह अकेले नहीं उठाना है, और उसे भी नहीं। एक doctor ठीक से मदद कर सकते हैं, और इसका सामना एक टीम की तरह, जल्दी करना, इंतजार करने से कहीं ज्यादा दरवाजे खोलता है।
वो जिस दौर से गुजर रही है, उसके लिए सचमुच मदद मौजूद है, और उसके लिए जल्दी हाथ बढ़ाना उसे बेहतर काम करने लायक बनाता है। एक doctor समझ सकते हैं कि क्या हो रहा है, दूसरी वजहों को टटोल कर हटा सकते हैं, और आप दोनों के साथ मिलकर एक योजना बना सकते हैं। सबसे काम की बात जो आप कर सकते हैं, वो यह है कि इसे "हम" बनाइए, "उसकी सुलझाने की समस्या" नहीं। इसका सामना साथ में, एक जोड़ी की तरह करना ही उस फर्क का हिस्सा है; जिन माँओं को उनके साथी के साथ मिलकर सहारा मिलता है, वो अकेले जूझने के लिए छोड़ दी गई माँओं से बेहतर होती हैं।
मदद माँगना यह मान लेना नहीं है कि आप में से किसी ने हार मान ली। यह उसका ठीक उल्टा है।
दवाई का क्या? कभी कभी एक doctor एक तरह की दवाई सुझा सकते हैं जो मन को संभालने में मदद कर सकती है, और ऐसा कोई भी फैसला संभल कर, उसके साथ, दूध पिलाने और बाकी सब को तौलते हुए लिया जाता है, कभी जल्दबाजी में नहीं और कभी समझ और सहारे की जगह नहीं। अक्सर पहली और सबसे बड़ी मदद इससे सीधी होती है: आराम, असली घर काम का सहारा, कोई बात करने वाला, और आप दोनों का एक टीम की तरह इसका सामना करना।
आपके साथ खड़े हैं
जिन रातों में आपका सब्र चुक जाए, और फिर उसके लिए आपको बहुत बुरा लगे, तो यह साफ साफ सुन लीजिए। एक साथी जो उसके दौर को समझने के लिए एक पूरी किताब पढ़ता है, वो उसे नाकाम नहीं कर रहा। वो उसके लिए लड़ रहा है। वो आप हैं।
हाथ बढ़ाने से पहले आपके पास हर जवाब होना जरूरी नहीं है। जो आपने देखा है, वो साथ ले जाइए: मुश्किल पल कब आते हैं, क्या मदद करता दिखता है, आपको सबसे ज्यादा किस बात की फिक्र है, वो सो और खा पा रही है या नहीं। doctor को ठीक यही चाहिए होता है, और यह एक डरावनी पहली मुलाकात को एक ऐसी योजना में बदल देता है जिसे आप तीनों साथ मिलकर बनाते हैं। अगर कभी यह जरूरी लगे, तो अपॉइंटमेंट का इंतजार मत कीजिए; एक doctor या एक helpline उसी दिन मौजूद है।
जो औरत इन भारी शुरुआती हफ्तों में खुद को खोई हुई महसूस करती है, वो अपने आप में लौट सकती है, और अक्सर किसी और मजबूत चीज तक भी, बशर्ते उसे अकेले जूझने के लिए छोड़ने के बजाय समझा और सहारा दिया जाए।
अपने फोन पर लिख लीजिए, वो दो या तीन बातें जो अभी उसे लेकर आपको सबसे ज्यादा परेशान करती हैं, और एक या दो बातें जो उसके होने में आपको सबसे ज्यादा प्यारी लगती हैं। दोनों संभाल कर रखिए। किसी doctor की मुलाकात में, या किसी मुश्किल बातचीत में, दोनों को साथ लेकर चलना नजर को वहीं रखता है जहाँ उसे रहना चाहिए: उस पर, उसके पूरे वजूद पर, और इस पर कि वो इससे आपके साथ मिलकर पार निकल रही है।
यह जानकारी कहाँ से है
यह गाइड समझने में मदद करती है। यह निदान नहीं है। उसके लिए डॉक्टर से मिलें।