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Pregnancy and new parenthoodA gentle, plain guide for a pregnant woman carrying heavy worry: what the anxiety is really telling you, why it is common and not your fault, and simple ways to carry it more lightly.
अगर प्रेग्नेंसी ने आपके मन को चिंता से भर दिया है, तो न आप कमज़ोर हैं और न ही आप एक बुरी होने वाली माँ हैं। प्रेग्नेंसी में मन का चिंतित रहना बहुत आम बात है, और इसमें मदद मिल सकती है।
शायद चिंता पहले छोटी थी और फिर बढ़ती चली गई। क्या बच्चा आज ठीक से हिल-डुल रहा है। क्या यह दर्द सामान्य है। कहीं डिलीवरी के वक़्त कुछ गड़बड़ न हो जाए। क्या मैं तैयार हूँ भी या नहीं। ये सोचें रात को आती हैं और बंद ही नहीं होतीं, और सुबह तक आप दिन शुरू होने से पहले ही थक चुकी होती हैं।
आप इसे मन ही मन नहीं बना रहीं, और आप अकेली तो बिलकुल भी नहीं हैं। प्रेग्नेंसी के दौरान चिंतित या घबराया हुआ महसूस करना बहुत आम बात है, यह आपकी कोई कमी नहीं है। बड़ी स्टडीज़ में देखा गया है कि करीब हर पाँच में से एक गर्भवती महिला चिंता महसूस करती है, और जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी आगे बढ़ती है यह बढ़ती जाती है, सबसे ज़्यादा आख़िरी तीन महीनों में। तो अगर चिंता आपको अभी, आख़िर के दिनों में सबसे भारी लग रही है, तो यही वो वक़्त है जब बहुत सी महिलाओं को यह सबसे ज़्यादा महसूस होती है।
यह किताब आप पर कोई ठप्पा नहीं लगाएगी। वह सिर्फ़ एक doctor ही कर सकते हैं। यह आपको यह समझने में मदद करेगी कि आपके मन में क्या चल रहा है, और आपको कुछ नरम, सच्चे तरीक़े दिखाएगी जिनसे यह चिंता थोड़ी हल्की करके उठाई जा सके।
मीरा की प्रेग्नेंसी को इकतीस हफ़्ते हो चुके हैं। बाहर से सब ठीक दिखता है, प्रेग्नेंसी सेहतमंद है और घर के लोग खुश हैं। पर उसके मन के अंदर एक आवाज़ है जो चुप ही नहीं होती। वह रात भर जागकर बच्चे की हलचल गिनती रहती है, हर छोटी सी टीस को बार-बार सोचती है, और डिलीवरी को लेकर सबसे बुरा सोचती रहती है। उसने किसी को नहीं बताया कि यह कितना भारी लगता है, क्योंकि लोग कहेंगे भी क्या। सब उसे यही कहते रहते हैं कि यह तो उसकी ज़िंदगी का सबसे खुशहाल वक़्त है।
मीरा के लिए, और शायद आपके लिए भी, यही सबसे मुश्किल हिस्सा है। आपसे कहा जाता है कि आप खिली-खिली और शुक्रगुज़ार रहें, इसलिए यह चिंता बाक़ी सब के ऊपर एक छिपी हुई कमी जैसी लगती है। पर ऐसा नहीं है। यह चिंता इस बात का इशारा नहीं है कि आप एक बुरी माँ बनेंगी। यह तो एक थका हुआ, ज़रूरत से ज़्यादा बोझ उठाता मन है जो आपके बच्चे को महफ़ूज़ रखने के लिए ओवरटाइम काम कर रहा है।
अगले कुछ दिनों तक बस चिंता को उससे लड़े बिना नोटिस कीजिए। जब कोई चिंता वाली सोच आए, तो उसे धीरे से नाम दीजिए: "लो, फिर वही चिंता आ गई।" आप अभी कुछ हल नहीं कर रहीं। आप बस उसकी शक्ल पहचान रही हैं, कि वह दिन के किस वक़्त आती है, और कौन सी बात उसे ज़्यादा तेज़ कर देती है।
प्रेग्नेंसी में चिंता एक आम, समझ में आने वाली हालत है, एक ऐसे मन की जिस पर बोझ है। सिर्फ़ चिंता आपके बच्चे को नुक़सान नहीं पहुँचा रही, और इसे समझ लेना खुद को दोष देने से कहीं ज़्यादा मदद करता है।
प्रेग्नेंसी के दौरान की भारी, लगातार चलने वाली चिंता को अंग्रेज़ी में antenatal anxiety कहते हैं। "Antenatal" का मतलब बस इतना है, जन्म से पहले। यह कोई अनोखी या शर्म की बात नहीं है। यह प्रेग्नेंसी के सबसे आम अनुभवों में से एक है, और इसका समझ में आना ठीक भी है: आपका शरीर बदल रहा है, आपकी ज़िंदगी पूरी तरह बदलने वाली है, और आपका मन एक साथ इन सब चीज़ों के लिए तैयार होने की कोशिश कर रहा है।
ऐसा महसूस करने में आप अकेली बिलकुल नहीं हैं। इस तरह की चिंता कई देशों और घरों की गर्भवती महिलाओं में दिखती है, और भारत के जैसे साधारण मध्यम और कम आमदनी वाले परिवारों में यह उतनी ही आम है, शायद उससे भी ज़्यादा। यह न किसी अमीर देश की समस्या है और न किसी कमज़ोर इंसान की। यह बिलकुल आपके जैसे घरों में रहती है।
मुझे लगता था कि ऐसा महसूस करने में मुझमें ही कोई खराबी है। यह जानना कि इसका एक नाम है, और इतने सारे और लोग भी ऐसा ही महसूस करते हैं, पहली बार था जब मैं चैन की साँस ले पाई।
मीरा, 31 हफ़्ते
अब वह हिस्सा जिसे नरमी से थामे रखना ज़रूरी है। यह चिंता खुद, ये तेज़ दौड़ती सोचें और नींद के बिना बीती रातें, अपने आप में आपके बच्चे को नुक़सान नहीं पहुँचा रहीं। आपके चिंतित होने भर से आपके बच्चे को नुक़सान नहीं होता। जो बात मायने रखती है वह यह नहीं कि आप चिंता महसूस करती हैं, बल्कि यह कि आपको इसे अकेले और बिना मदद के उठाना न पड़े।
चिंता सिर्फ़ मन में नहीं, शरीर में भी दिख सकती है: दिल का तेज़ धड़कना, छाती का जकड़ जाना, पेट में हलचल, और थके होने पर भी नींद न आना। ये शरीर के अलार्म सिस्टम के ज़रूरत से ज़्यादा बजने की निशानी हैं, इसका मतलब यह नहीं कि प्रेग्नेंसी में कुछ गड़बड़ है। यह जान लेना ही कि यह एहसास चिंता है, कोई खतरा नहीं, अपने आप में इसमें से थोड़ा डर निकाल देता है।
याद रखिए
चिंता महसूस करना आपको बुरी माँ नहीं बनाता, और अपने आप में यह आपके बच्चे को नुक़सान नहीं पहुँचा रहा। यह एक बहुत आम एहसास है जो सहारा मिलने पर ठीक होता है। सबसे अच्छी और काम की बात जो आप कर सकती हैं, वह यह है कि इसे शर्म की चीज़ नहीं, बल्कि ऐसी चीज़ मानें जिसमें मदद ली जा सकती है।
आपको चिंता को ज़बरदस्ती दूर धकेलने की ज़रूरत नहीं है। कुछ आसान, रोज़मर्रा की आदतें प्रेग्नेंसी में चिंतित मन को सचमुच शांत करती हैं, और इनमें से कोई भी एक पैसा नहीं माँगती।
आप चिंतित मन से बहस करके उसे चुप नहीं करा सकतीं, और न ही आपको ऐसा करना है। जो काम आता है वह चिंता से लड़ना नहीं, बल्कि उसके नीचे की ज़मीन को थोड़ा-थोड़ा, बार-बार नरम करना है। रोज़ दोहराई जाने वाली छोटी-छोटी शांत आदतें, किसी एक बड़ी कोशिश से ज़्यादा काम करती हैं।
मन और शरीर की आसान आदतें प्रेग्नेंसी में चिंतित मन को सचमुच हल्का कर सकती हैं। ऐसे तरीक़े जो धीमी साँस लेना, इस पल में नरमी से ध्यान लगाना, और शरीर को शांत करना सिखाते हैं, उनसे गर्भवती महिलाओं में चिंता, उदासी और तनाव कम होते देखे गए हैं।
इनमें से दो को थोड़ा क़रीब से देखना ज़रूरी है। पहली, साँस। जब चिंता बढ़ती है तो साँस तेज़ और छोटी हो जाती है, जो शरीर को बताती है कि कोई खतरा है। साँस को धीमा करना, ख़ासकर बाहर की साँस को अंदर की साँस से लंबा करना, इसका उलटा इशारा भेजता है, और शरीर शांत होने लगता है। यह आसान है, मुफ़्त है, और आप इसे कहीं भी कर सकती हैं, रात के 2 बजे जागते हुए भी।
दूसरी, इसे अकेले न उठाना। चिंता को अकेले न उठाना सचमुच मायने रखता है। जिन महिलाओं को लगता है कि उनके पास कोई सहारा है, पति, परिवार या कोई भरोसे का दोस्त, वे प्रेग्नेंसी में चिंता से कम जूझती हैं, जबकि बिना सहारे के महसूस करना चिंता को और भारी कर देता है। आपको बड़े घेरे की ज़रूरत नहीं है। एक ऐसा इंसान जो बिना जज किए सुन ले, बोझ हल्का करने के लिए काफ़ी है।
बातचीत से मिलने वाली मदद भी काम करती है, और इसके लिए किसी क्लिनिक में बैठना ज़रूरी नहीं। ऐसे तरीक़ेदार प्रोग्राम जो चिंता वाली सोचों को सँभालना सिखाते हैं, जिनमें वे भी शामिल हैं जिन्हें आप घर बैठे या फ़ोन पर कर सकती हैं, उनसे प्रेग्नेंसी में चिंता और उदासी कम होते देखी गई है। तो अगर किसी क्लिनिक तक पहुँचना मुश्किल है, तब भी जहाँ आप हैं वहीं मदद पाने के सच्चे, आज़माए हुए तरीक़े मौजूद हैं।
आज रात यह कीजिए। धीरे-धीरे चार तक गिनते हुए साँस अंदर लीजिए, फिर धीरे-धीरे छह तक गिनते हुए साँस बाहर छोड़िए। बस दो मिनट के लिए ऐसा कीजिए। ध्यान दीजिए कि आख़िर में आपका शरीर थोड़ा भारी और थोड़ा शांत कैसे महसूस होता है। यह आपका है, जब भी चिंता बढ़े इसे काम में लाइए।
प्रेग्नेंसी में कुछ चिंता होना बिलकुल सामान्य है। पर जो चिंता भारी हो, लगातार रहे, और आपकी नींद और आपके दिन छीन ले, उसके लिए किसी को दिखाना ठीक है, इसलिए नहीं कि वह खतरनाक है, बल्कि इसलिए कि आप सहारे की हक़दार हैं।
हर गर्भवती महिला कभी न कभी चिंता करती है। थोड़ी चिंता जो आती-जाती रहे, जिसे आप एक तरफ़ रखकर किसी अच्छे पल का मज़ा ले सकें, बच्चा पालने का एक सामान्य हिस्सा है। ऐसी चिंता को doctor की ज़रूरत नहीं। उसे बस थोड़ी नरमी और आराम की ज़रूरत है।
और मदद तब लेनी चाहिए जब चिंता आम चिंता जैसी लगनी बंद हो जाए: जब वह लगभग हर वक़्त बनी रहे, जब वह रात दर रात आपकी नींद छीन ले, जब आप किसी भी चीज़ का मज़ा न ले पाएँ, जब आपका शरीर लगातार तने हुए तार जैसा महसूस हो, या जब डरावनी सोचें आपका पीछा ही न छोड़ें। भारी, लगातार चिंता जो आपके दिनों पर हावी हो जाए, वह दिखाने का इशारा है, आप पर कोई फ़ैसला नहीं।
जल्दी दिखाना फ़ायदे का है, और इसकी असली वजह ईमानदारी से यह है। इसलिए नहीं कि सिर्फ़ चिंता आपके बच्चे को नुक़सान पहुँचाती है। बल्कि इसलिए कि जल्दी मदद मिल जाना आप दोनों के लिए अच्छा है। औसतन, जिन माँओं को ज़्यादा चिंता रहती है और उसका इलाज नहीं होता, उनमें बच्चे के थोड़ा जल्दी या थोड़ा छोटा पैदा होने का मौक़ा थोड़ा बढ़ जाता है, और सहारा मिलने से यह बोझ हल्का होता है।
एक नरम बात
अगर इस पन्ने से आप एक बात लें, तो वह यही हो। मदद माँगना इसलिए नहीं है कि आप नाकाम हो गईं, और न ही इसलिए कि आपके बच्चे में कुछ गड़बड़ है। यह इसलिए है कि जब आपको सहारा मिलता है तो आप और आपका बच्चा दोनों बेहतर रहते हैं। माँगना ताक़त है, कमज़ोरी नहीं। अगर चिंता कभी बहुत गहरी या डरावनी हो जाए, तो अपने doctor को या किसी हेल्पलाइन को जल्द बताइए, और मत रुकिए।
किसी से बात करने से पहले आपका यह पक्का होना ज़रूरी नहीं कि यह "काफ़ी बुरा" हो गया है। अगर आप सोच रही हैं कि कहीं आपकी चिंता बहुत बड़ी तो नहीं हो गई, तो यह सोचना ही अपने अगले चेक-अप में इसका ज़िक्र करने के लिए काफ़ी वजह है। कोई doctor या नर्स इसे महीनों तक चुपचाप उठाते रहने के बजाय जल्दी सुन लेना कहीं ज़्यादा पसंद करेंगे।
चिंतित मन को अक़्सर डिलीवरी का ही सबसे ज़्यादा डर होता है। आप डिलीवरी की हर चीज़ पर काबू नहीं रख सकतीं, पर आप कुछ ऐसे तरीक़ों से तैयारी कर सकती हैं जिनसे अनजाना कम डरावना लगने लगे।
बहुत सी चिंतित माँओं के लिए सबसे बड़ा डर खुद डिलीवरी होती है। दर्द, अनजाना, और वे सब चीज़ें जो अलग तरह से हो सकती हैं। इस डर का कुछ हिस्सा यह न जानने से आता है कि क्या होने वाला है, और ज़्यादा जान लेना अक़्सर मदद करता है। अपने doctor या नर्स से कहिए कि वे आपको एक-एक कदम समझाएँ कि आम तौर पर क्या होता है। जो डिलीवरी समझा दी गई हो, वह अँधेरे में सोची गई डिलीवरी से कम डरावनी होती है।
आप पहले से नरमी से तैयारी भी कर सकती हैं। अपना बैग जल्दी पैक कर लीजिए ताकि वह एक चिंता कम हो जाए। तय कर लीजिए कि आपके साथ कौन रहेगा। अपनी धीमी साँस का अभ्यास अभी से कीजिए, ताकि जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो तब वह जानी-पहचानी लगे। आप डिलीवरी की हर चीज़ पर काबू नहीं रख सकतीं, पर जिन हिस्सों की तैयारी आप कर सकती हैं उन्हें कर लेना बाक़ी को छोटा कर देता है।
यह याद रखना काम आता है कि उस दिन आप अकेली नहीं होंगी, और आपको यह सब अपने दिमाग़ में सँभालकर रखने की ज़रूरत नहीं। doctor और नर्सें यह हर एक दिन करते हैं और वे आपको हर मरहले में सँभालेंगे। आपका काम डिलीवरी को सँभालना नहीं है। आपका काम साँस लेना है, अपने आसपास के लोगों पर टेक लगाना है, और उन्हें अपना काम करने देना है। अपने सवाल पहले से लिख लीजिए ताकि उस पल में आपको वे याद न रखने पड़ें।
डिलीवरी को लेकर जो चीज़ें आपको सबसे ज़्यादा डराती हैं, उनकी एक छोटी सी लिस्ट बना लीजिए। अपनी अगली मुलाक़ात में अपने doctor या नर्स से कहिए कि वे बस ऊपर की दो चीज़ें आपको समझा दें। किसी धुँधले डर को एक साफ़, जवाब मिले हुए सवाल में बदल देना, उसे छोटा करने के सबसे तेज़ तरीक़ों में से एक है।
आपको यह अकेले नहीं उठाना है। सहारा कई शक्लों में आता है, आपके आसपास के लोगों से लेकर आपके doctor तक, और आगे बढ़कर मदद माँगना ताक़त की निशानी है।
मदद कोई एक ही चीज़ नहीं है, और इसकी शुरुआत किसी क्लिनिक से होना ज़रूरी नहीं। यह अपने पति को यह बताने से शुरू हो सकती है कि यह कितना भारी लगता है, या किसी माँ, बहन, या दोस्त पर टेक लगाने से जो बिना जज किए सुन ले। बस एक भरोसे के इंसान का सहारा महसूस करना ही चिंता को उठाना आसान कर देता है। एक संयुक्त परिवार में, जहाँ "लोग क्या कहेंगे" आपको अपनी भावनाएँ छिपाने पर मजबूर कर सकता है, वहाँ वह एक महफ़ूज़ इंसान ढूँढना और भी ज़्यादा मायने रखता है।
बातचीत से मिलने वाली मदद भी काम करती है, और इसका बहुत हिस्सा घर बैठे आप तक पहुँच सकता है। ऐसे तरीक़ेदार प्रोग्राम जो चिंता वाली सोचों को सँभालना सिखाते हैं, जिनमें वे भी हैं जिन्हें आप फ़ोन पर करती हैं, उनसे प्रेग्नेंसी में चिंता और उदासी कम होते देखी गई है। तो अगर किसी क्लिनिक तक पहुँचना मुश्किल भी हो, तब भी सच्ची मदद आप तक आ सकती है।
जब आप किसी doctor से बात करें, तो आपको एकदम सही शब्दों की ज़रूरत नहीं। बस सीधे-सीधे कह दीजिए: "मैं बहुत ज़्यादा चिंता कर रही हूँ और मन को शांत कर पाना मुश्किल हो रहा है।" उन्हें आपकी मदद करने के लिए इतना ही काफ़ी है। एक अच्छा doctor सुनेगा, इसे गंभीरता से लेगा, और आपके साथ मिलकर एक योजना बनाएगा, और हर फ़ैसले में आप शामिल रहती हैं। अगर बोलकर कहना आसान हो जाए तो अपने पति या परिवार के किसी सदस्य को साथ ले जाइए।
याद रखिए
चिंता में कोई शर्म नहीं है, और उसमें मदद माँगने में भी कोई शर्म नहीं। जो माँएँ आगे बढ़कर मदद माँगती हैं, वे नाकाम होने वाली नहीं होतीं। वे तो अपना और अपने बच्चों का ख़याल रखने वाली होती हैं। वह आप हो सकती हैं, आज से ही शुरू करके।
जो मन आज रात इतनी चिंता कर रहा है, वही मन आपके बच्चे को महफ़ूज़ रखने के लिए पहले से जी-जान से लगा हुआ है, और वह उस प्यार को और नरमी से उठाना सीख सकता है।
आज सोने से पहले, एक छोटी सी अच्छी चीज़ का नाम लीजिए जो आप कल अपने लिए कर सकती हैं: एक धीमी सैर, किसी भरोसे के इंसान को एक फ़ोन, दो मिनट की धीमी साँस, या बस किसी एक इंसान को यह बता देना कि आप सच में कैसा महसूस कर रही हैं। उसे लिख लीजिए, और कल की शुरुआत वहीं से होने दीजिए।
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और पढ़ने के लिए
यह गाइड समझने में मदद करती है। यह निदान नहीं है। उसके लिए डॉक्टर से मिलें।